कैमूर सेंचुरी प्रकरण में ‘काउंटर नैरेटिव’ की परतें खुलीं, जांच के केंद्र में मास्टरमाइंड प्रतिपालक चुर्क का नाम बरकरार▪️काउंटर खबर के जरिए जांच से ध्यान भटकाने को उछाली गई खबर, जांच के घेरे में प्रतिपालक चुर्क की भूमिका▪️कैमूर सेंचुरी में ‘रक्षक’ ही बना ‘भक्षक’ : बिना अनुमति अवैध मोरंग खनन और सड़क निर्माण का सनसनीखेज खुलासा

मिर्जापुर। कैमूर वन्यजीव अभयारण्य अंतर्गत हलिया–चौरा क्षेत्र में अवैध मोरंग खनन और सड़क निर्माण को लेकर जारी विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। प्रतिपालक चुर्क भास्कर प्रसाद पाण्डेय के पक्ष में प्रकाशित कराई गई खबर—जिसमें रिटायर वन क्षेत्राधिकारी अवधनारायण मिश्रा को अवैध अतिक्रमण एवं खनन का “मास्टरमाइंड” बताया गया— जो अब सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों और विभागीय सूत्रों का कहना है कि यह खबर मूल प्रकरण से ध्यान भटकाने और जिम्मेदारी स्थानांतरित करने की कोशिश प्रतीत हो रही है।
जानकारी के अनुसार, 20 से 23 दिसंबर 2025 में क्षेत्रीय वनाधिकारी की अनुपस्थिति के दौरान संरक्षित वन भूमि से बड़े पैमाने पर खनन और सड़क निर्माण कराया गया, जिसके वीडियो साक्ष्य उच्चाधिकारियों तक पहुंच चुके हैं। विभागीय भ्रमण में सामने आए तथ्यों के आधार पर सेक्सन/बीट स्तर पर सूचना छुपाने और वैधानिक कार्रवाई न करने की गंभीर चूक उजागर हुई।इसी क्रम में वन कर्मियों द्वारा मौखिक रूप से प्रतिपालक चुर्क के दबाव का उल्लेख भी किया गया, हालांकि संबंधित पक्ष ने अब तक लिखित स्पष्टीकरण नहीं दिया है। इसी बीच, सोशल मीडिया (व्हाट्सअप ग्रुपों) में वॉयरल रिपोर्ट में सारा ठीकरा रिटायर अधिकारी पर फोड़ने का प्रयास किया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह खबर न तो स्थल-आधारित तथ्यों से मेल खाती है और न ही मौजूदा जांच निष्कर्षों का संतुलित प्रस्तुतीकरण करती है। उनका कहना है कि जांच अधिकारी पर दोषारोपण कर वास्तविक जिम्मेदारियों से ध्यान हटाया जा रहा है, जबकि अवैध खनन के हालिया निशान, मशीनों के उपयोग और त्वरित निर्माण के प्रमाण क्षेत्र में स्पष्ट हैं।
ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की मांग है कि पीसीसीएफ स्तर से निष्पक्ष, समयबद्ध और बहु-स्तरीय जांच कराई जाए, जिसमें वर्तमान प्रकरण, वीडियो साक्ष्य, विभागीय चूक और सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका का समग्र मूल्यांकन हो। उनका यह भी कहना है कि किसी एक व्यक्ति को कठघरे में खड़ा कर बाकी जिम्मेदारियों को ढंकना कैमूर जैसे संवेदनशील अभयारण्य के संरक्षण के हित में नहीं है।
फिलहाल, मामला उच्च स्तर पर विचाराधीन बताया जा रहा है। देखना होगा कि जांच निष्कर्ष किस दिशा में जाते हैं और क्या दोषियों पर त्वरित व कठोर कार्रवाई सुनिश्चित हो पाती है, ताकि संरक्षित वन क्षेत्र की गरिमा और कानून का भरोसा कायम रहे।

रूबरू इंडिया न्यूज़ डेस्क
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