प्रतापगढ़। अधिवक्ता सद्दाम हुसैन की कथित अवैध गिरफ्तारी और पुलिस की कार्रवाई को लेकर सोमवार को जिला न्यायालय परिसर में पूरे दिन गहमा-गहमी का माहौल रहा। रविवार दोपहर से ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने मामले को और तूल दे दिया, जिसमें बिना नंबर की पुलिस गाड़ी से अधिवक्ता को जबरन बैठाकर ले जाते हुए और बाद में थाने की फर्श पर बैठाए जाने के दृश्य सामने आए। इन वीडियो के सामने आने के बाद अधिवक्ता समाज में भारी आक्रोश देखने को मिला।
अधिवक्ताओं का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि अधिवक्ता समाज को बदनाम करने की साजिश भी है। सुबह से ही न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं के समूह एकत्र होकर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते नजर आए। अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बिना वैध प्रक्रिया का पालन किए अधिवक्ता सद्दाम हुसैन को हिरासत में लिया और उसके साथ अमर्यादित व्यवहार किया, जो पूरी न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
मामले की सुनवाई के दौरान जब न्यायालय ने तथ्यों और प्रस्तुत साक्ष्यों का अवलोकन किया, तो पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अभियोजन पक्ष की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय के आदेश के बाद जैसे ही यह खबर न्यायालय परिसर में फैली, अधिवक्ताओं में खुशी की लहर दौड़ गई। अधिवक्ताओं ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर फैसले का स्वागत किया और इसे “न्याय की जीत” बताया।
अधिवक्ताओं ने कहा कि पुलिस अक्सर अधिवक्ता समाज को दबाने और बदनाम करने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती है, लेकिन इस बार न्यायालय ने सच्चाई के आधार पर फैसला देकर पुलिस को करारा जवाब दिया है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि समय रहते वीडियो सामने नहीं आते, तो शायद सच्चाई दबा दी जाती। सोशल मीडिया की भूमिका को भी अधिवक्ताओं ने अहम बताया और कहा कि इससे आमजन के साथ-साथ न्यायालय के सामने भी वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकी।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “आज का दिन अधिवक्ता समाज के लिए ऐतिहासिक है। पुलिस ने अधिवक्ता को जिस तरह बिना नंबर की गाड़ी से उठाया और थाने की फर्श पर बैठाया, वह निंदनीय है। न्यायालय ने पुलिस को मुंह के बल गिरने पर मजबूर कर दिया है।” वहीं, युवा अधिवक्ता मोहम्मद असलम, मो इमरान, जुबैर आदि अधिवक्ताओं ने कहा कि यह फैसला भविष्य में पुलिस को मनमानी करने से रोकेगा।
अधिवक्ताओं ने यह भी मांग की कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी अधिवक्ता या नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार न हो। उन्होंने कहा कि अधिवक्ता समाज न्याय व्यवस्था का अभिन्न अंग है और उसका सम्मान बनाए रखना शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है।
न्यायालय परिसर में फैसले के बाद काफी देर तक अधिवक्ताओं की मौजूदगी बनी रही। “न्याय की जीत” और “अधिवक्ता एकता जिंदाबाद” जैसे नारे लगाए गए। कई अधिवक्ताओं ने कहा कि यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे अधिवक्ता समाज की जीत है।
फिलहाल, इस पूरे प्रकरण के बाद पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। वहीं अधिवक्ता समाज ने साफ कर दिया है कि यदि भविष्य में इस तरह की कोई भी कार्रवाई होती है, तो वे एकजुट होकर इसका विरोध करेंगे। न्यायालय के इस फैसले ने अधिवक्ताओं में नया आत्मविश्वास भर दिया है और इसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रतापगढ़ की अदालत ने थाना कंधई के मुकदमा संख्या 03/2026 से जुड़ी सुनवाई में अहम आदेश पारित किया है। अदालत ने अभियुक्तों जुवैद अहमद, सहाम अली और इरफान अली के खिलाफ लगाई गई धारा 308(6) भारतीय न्याय संहिता को हटाते हुए इस धारा में रिमांड स्वीकार करने से इंकार कर दिया है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केस डायरी, प्रथम सूचना रिपोर्ट, वादी व गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट नहीं होता कि अभियुक्तों द्वारा किसी को जान से मारने की नीयत से हमला किया गया हो या ऐसे आरोप लगाने का पर्याप्त आधार मौजूद हो। केवल मुकदमे में फंसाने की धमकी का उल्लेख धारा 308(6) के आवश्यक तत्वों को पूर्ण नहीं करता।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अन्य धाराएं—115(2), 126, 352 और 351(2) भारतीय न्याय संहिता—सात वर्ष तक के कारावास से दंडनीय हैं। इन धाराओं में प्रत्येक आरोपी जुनैद अहमद पुत्र अब्दुल सलाम, सद्दाम हुसैन पुत्र उमर अली ,इरफान पुत्र अब्दुल रऊफ को 20-20 हजार रुपये के व्यक्तिगत मुचलके पर जमानत प्रदान की गई है।




