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उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बयानों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब लगातार गहराता जा रहा है। यह मामला अब सिर्फ धार्मिक या वैचारिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक गलियारों में भी इसका असर साफ दिखने लगा है। बीते दो दिनों में दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के इस्तीफों ने इस विवाद को नई दिशा दे दी है और सरकार, विपक्ष, संत समाज तथा नौकरशाही—सभी के बीच बहस तेज हो गई है।


सोमवार को बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद मंगलवार को अयोध्या के जीएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रशांत कुमार सिंह ने यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में उठाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शंकराचार्य द्वारा मुख्यमंत्री योगी पर की गई टिप्पणी से वे बेहद आहत हैं और मुख्यमंत्री का अपमान वे बर्दाश्त नहीं कर सकते।


जाने कौन हैं प्रशांत कुमार सिंह


48 वर्षीय प्रशांत कुमार सिंह मूल रूप से मऊ जिले के सरवा गांव के निवासी हैं। उनका प्रशासनिक करियर लंबा और विविध रहा है। उन्हें पहली नियुक्ति सहारनपुर में मिली थी। इसके बाद वे कानपुर में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। 21 अक्टूबर 2023 को उनकी पोस्टिंग अयोध्या में जीएसटी डिप्टी कमिश्नर के रूप में हुई थी।


अयोध्या जैसे संवेदनशील और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिले में तैनात प्रशांत कुमार सिंह को एक शांत और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के रूप में जाना जाता रहा है। उनके इस्तीफे की खबर सामने आते ही प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई। जीएसटी अपर आयुक्त संतोष कुमार, एडीएम और एसपी सिटी स्वयं उनके कार्यालय पहुंचे और स्थिति की जानकारी ली।


इस्तीफे के बाद भावुक क्षण


इस्तीफा देने के बाद प्रशांत कुमार सिंह का एक भावनात्मक पक्ष भी सामने आया। उन्होंने पत्नी से फोन पर बात की और “हैलो” कहते ही भावुक हो गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उनका गला रूंध गया और वे खुद को संभाल नहीं सके। रोते हुए उन्होंने पत्नी से कहा कि उनका मन बेहद व्यथित था और वे लंबे समय से मानसिक पीड़ा में थे।
उन्होंने कहा, “मैं पिछले दो रातों से सो नहीं पाया था। मैंने यह फैसला किसी आवेग में नहीं लिया, बल्कि लंबे आत्ममंथन के बाद लिया है।” उन्होंने यह भी कहा कि उनकी दो छोटी बेटियां हैं और वे चाहते हैं कि उनके बच्चे यह देखें कि उनका पिता सही और गलत के बीच खड़े होने से नहीं डरा।


प्रशांत कुमार सिंह के शब्दों में, “जिसका नमक खाते हैं, उसका सिला अदा करना चाहिए। मैं उसी प्रदेश से वेतन लेता हूं, उसी सरकार के तहत काम करता हूं। अगर उसी नेतृत्व के खिलाफ अपमानजनक बातें हों और मैं चुप रहूं, तो यह मेरे लिए संभव नहीं है।”


‘संविधान में विरोध का तरीका तय है’


अपने बयान में जीएसटी डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि वे तब तक अपना सरकारी काम करते रहेंगे, जब तक उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं हो जाता। इसके बाद वे समाज के लिए उपलब्ध साधनों के माध्यम से काम करेंगे।
उन्होंने कहा, “संविधान में विरोध करने का तरीका तय है, लेकिन ठेला गाड़ी या पालकी पर बैठकर मुख्यमंत्री को उल्टा-सीधा नहीं कहा जा सकता। मुख्यमंत्री हमारे अन्नदाता हैं।” उन्होंने समाज में वैमनस्य फैलाने वाले बयानों पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे वक्तव्यों से समाज जातियों में बंटने लगता है और गलत माहौल बनता है।


शंकराचार्य पर गंभीर आरोप
प्रशांत कुमार सिंह ने अपने इस्तीफे में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ अनर्गल बयान दे रहे हैं, जो राष्ट्र, संविधान और लोकतंत्र के विरुद्ध हैं।


उनका आरोप है कि शंकराचार्य भोले-भाले अधिकारियों को प्रलोभन देकर सरकार के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने इसे संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ साजिश करार दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि शंकराचार्य द्वारा समाज में जातिवाद का जहर घोला जा रहा है, जिससे देश और प्रदेश को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है।


प्रशांत कुमार सिंह ने साफ कहा, “कोई अपमानजनक टिप्पणी करे और मैं रोबोट की भांति केवल वेतन लेता रहूं—यह मुझे स्वीकार नहीं है। अपने राज्य और मुख्यमंत्री योगी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी सुनते रहना मेरे लिए संभव नहीं।”


योगी पर शंकराचार्य की टिप्पणी से बढ़ा विवाद


पूरा विवाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के 21 जनवरी को दिए गए बयान से और अधिक उग्र हो गया। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तुलना अकबर और औरंगजेब से करते हुए कहा था कि “यही योगी, जिसे आप लोग साधु-संत कहते हैं, हिंदू कहने के लायक नहीं है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री मंदिर तोड़े जाने के मामलों पर चुप रहे ताकि उनकी सत्ता बनी रहे।


वाराणसी में कथित तौर पर 150 से अधिक मंदिरों को तोड़े जाने का जिक्र करते हुए शंकराचार्य ने कहा था कि मुख्यमंत्री की ओर से इस पर एक शब्द तक नहीं कहा गया। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को “सत्ता लोभी” बताते हुए तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।


इससे पहले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा
इस विवाद से पहले सोमवार को बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने भी अपने पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने अपने इस्तीफे की वजह यूजीसी के नए कानून और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों की कथित पिटाई को बताया था। इस तरह महज दो दिनों के भीतर दो अधिकारियों के इस्तीफे ने पूरे प्रदेश में प्रशासनिक स्थिरता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सियासी घमासान
इन इस्तीफों के बाद सियासी माहौल भी गर्म हो गया है। सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आस्था और विश्वास की जीत बताया है। वहीं विपक्ष इसे प्रशासन पर बढ़ते राजनीतिक दबाव का उदाहरण बता रहा है।


विशेषज्ञों का मानना है कि किसी अधिकारी का वैचारिक मतभेद के आधार पर इस्तीफा देना असामान्य है और यह प्रशासनिक तटस्थता पर बहस को जन्म देता है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत नैतिकता का फैसला बता रहे हैं, तो कुछ इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चिंताजनक संकेत मान रहे हैं।
आगे क्या?


फिलहाल प्रशांत कुमार सिंह का इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार होना बाकी है। प्रशासनिक स्तर पर उनसे बातचीत जारी है और उन्हें समझाने की कोशिश भी की जा रही है। दूसरी ओर, शंकराचार्य के बयानों और उनके असर को लेकर बहस थमने का नाम नहीं ले रही।


यह मामला अब केवल एक बयान या एक इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल खड़ा कर रहा है कि धर्म, राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है और क्या ऐसे घटनाक्रम भविष्य में प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करेंगे।
उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन में चल रहा यह घटनाक्रम न सिर्फ राज्य, बल्कि देशभर में ध्यान आकर्षित कर रहा है। शंकराचार्य विवाद अब एक बड़े विमर्श का रूप ले चुका है, जिसमें आस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संवैधानिक मर्यादा और प्रशासनिक जिम्मेदारी—सभी मुद्दे आपस में गुथते नजर आ रहे हैं।

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