प्रतापगढ़। अपर सत्र न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) पारुल वर्मा की कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म और जान से मारने की धमकी देने के गंभीर मामले में आरोपी मनोज सिंह को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास तथा 60 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने साफ निर्देश दिया है कि अर्थदंड की पूरी राशि पीड़िता के चिकित्सकीय उपचार, मानसिक आघात की भरपाई और उसके पुनर्वास पर खर्च की जाए। इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता को उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष से भी नियमानुसार क्षतिपूर्ति राहत उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
यह मामला 1 सितंबर 2016 का है। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता दिन के समय गांव के लल्लू सिंह के घर जा रही थी। रास्ते में आरोपी मनोज सिंह ने उसे जबरन पकड़ा और घसीटते हुए अपने घर ले गया। वहां उसने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया और घटना की जानकारी किसी को देने पर जान से मारने की धमकी दी। पीड़िता ने न्यायालय में बताया कि घटना से करीब 15 दिन पहले भी आरोपी ने उसके साथ यही घिनौनी हरकत की थी, लेकिन उस समय भी भयवश वह चुप रही क्योंकि आरोपी ने धमकी दी थी कि बात खुलने पर वह उसे और उसके परिवार को नुकसान पहुँचाएगा।
घटना के बाद पीड़िता ने अपने परिजनों को पूरी बात बताई और मामला पुलिस तक पहुंचा। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर विवेचना की। मामले को विशेष अदालत में प्रस्तुत किया गया, जहां अभियोजन पक्ष ने 6 गवाहों की गवाही और 11 महत्वपूर्ण प्रदर्शों के माध्यम से आरोपों को सिद्ध करने में सफलता पाई। गवाहों में पीड़िता, उसके परिजन, चिकित्सकीय टीम और विवेचना अधिकारी शामिल थे, जिनकी सुसंगत गवाही ने अदालत को यह विश्वास दिलाया कि अपराध की परिस्थितियां स्पष्ट और प्रमाणिक हैं।
राज्य की ओर से विशेष लोक अभियोजक निर्भय सिंह ने पैरवी करते हुए अदालत के सामने विस्तृत रूप से बताया कि आरोपी ने नाबालिग के साथ न केवल घृणित अपराध किया बल्कि उसे लगातार डराकर चुप रहने के लिए मजबूर भी किया। उन्होंने दलील दी कि इस तरह के अपराध समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा करते हैं, इसलिए कड़ी सजा आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसे अपराधियों को सख्त संदेश मिले।
सभी साक्ष्यों, गवाहियों और परिस्थितियों का गहन परीक्षण करने के बाद अदालत ने मनोज सिंह को दोषी ठहराते हुए कहा कि नाबालिग के साथ की गई यह क्रूरता किसी भी रूप में क्षम्य नहीं है। न्यायालय ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि पीड़िता लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक पीड़ा से गुज़री है, इसलिए उसके पुनर्वास और उपचार के लिए आर्थिक सहायता अत्यंत आवश्यक है।
इस फैसले के बाद पीड़िता के परिवार ने न्यायालय के प्रति संतोष व्यक्त किया और कहा कि लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई का आज उन्हें उचित परिणाम मिला है। वहीं गांव के लोगों ने भी अदालत के फैसले का स्वागत किया और कहा कि यह निर्णय समाज में बेटियों की सुरक्षा के लिए सकारात्मक संदेश देता है।






