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भाषा विवाद के बीच कासिम की भावुक अपील- गरीब की मेहनत और उसके बच्चों का भविष्य मत छीनिए

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मराठी भाषा विवाद पर मुंबई हाईकोर्ट में प्रतापगढ़ के मोहम्मद कासिम ने रखा पक्ष, बोले- भाषा नहीं, गरीब ड्राइवरों की रोजी-रोटी और अधिकारों की लड़ाई

प्रतापगढ़। महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर चल रहे विवाद के बीच प्रतापगढ़ के याचिकाकर्ता मोहम्मद कासिम ने मुंबई हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए साफ किया है कि उनकी लड़ाई मराठी भाषा या मराठी भाषी लोगों के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि वह मराठी सहित संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त सभी 22 भाषाओं का सम्मान करते हैं। उनके द्वारा उठाया गया मुद्दा भाषा से कहीं अधिक गरीब और मेहनतकश लोगों की आजीविका तथा उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

मंगलवार दोपहर करीब 3 बजे मीडिया से बातचीत में मोहम्मद कासिम ने अपने पक्ष को विस्तार से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों से लोग रोजगार की तलाश में मुंबई आते हैं। मुंबई देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लोगों के लिए रोजगार का बड़ा केंद्र है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो टैक्सी, कैब और अन्य परिवहन सेवाओं से जुड़े होकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

भाषा के आधार पर रोजगार प्रभावित होने पर जताई चिंता

मोहम्मद कासिम ने कहा कि मुंबई में टैक्सी और कैब चलाने वाले कई चालक अपनी रोज की कमाई से परिवार का खर्च चलाते हैं। उनके मुताबिक कई ड्राइवर प्रतिदिन लगभग 500 से 1000 रुपये तक कमाकर अपने परिवार की जरूरतें पूरी करते हैं। इसी आमदनी से घर का राशन, बच्चों की पढ़ाई, किराया और दूसरी जरूरी जरूरतें पूरी की जाती हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति किसी विशेष भाषा को बोलने में सक्षम नहीं है तो केवल इसी आधार पर उसकी आजीविका प्रभावित करना कितना उचित है। उनका कहना है कि किसी गरीब ड्राइवर का बैज, परमिट या लाइसेंस केवल भाषा संबंधी शर्तों के कारण रद्द होने की स्थिति में इसका असर सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसके पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

कासिम ने कहा कि एक ड्राइवर के पीछे उसका पूरा परिवार खड़ा होता है। वह व्यक्ति रोज सड़क पर वाहन चलाकर जो पैसा कमाता है, उसी से बच्चों की पढ़ाई और परिवार का जीवन चलता है। ऐसे में रोजगार से जुड़े किसी दस्तावेज या अनुमति पर असर पड़ना परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर सकता है।

‘मराठी का सम्मान, सभी 22 भाषाओं का सम्मान’

मोहम्मद कासिम ने स्पष्ट किया कि उनकी याचिका को मराठी भाषा के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत भाषाई और सांस्कृतिक विविधता वाला देश है और हर भाषा का अपना महत्व है। वह मराठी भाषा और मराठी भाषी समाज का सम्मान करते हैं।

उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त सभी 22 भाषाओं का समान रूप से सम्मान किया जाना चाहिए। उनका उद्देश्य किसी भाषा की गरिमा को कम करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भाषा से जुड़े किसी प्रावधान के कारण गरीब व्यक्ति की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

कासिम के अनुसार, भाषा सीखना और किसी भाषा का सम्मान करना अलग विषय है, जबकि किसी व्यक्ति के रोजगार के अधिकार को प्रभावित करना अलग संवैधानिक प्रश्न है। उनका जोर इसी बात पर है कि भाषा संबंधी किसी व्यवस्था को लागू करते समय गरीब और दूसरे राज्यों से आए मेहनतकश लोगों के हितों को भी ध्यान में रखा जाए।

अधिसूचना की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला चाहते हैं कासिम

मोहम्मद कासिम के मुताबिक, उन्होंने मुंबई हाईकोर्ट के समक्ष संबंधित अधिसूचना की संवैधानिक वैधता का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि सरकार की ओर से यह बात सामने रखी गई है कि फिलहाल एक वर्ष तक आरटीओ द्वारा इस मामले में कार्रवाई नहीं की जाएगी।

हालांकि कासिम का कहना है कि केवल कार्रवाई पर अस्थायी रोक या एक वर्ष की अवधि निर्धारित किए जाने से मूल सवाल खत्म नहीं होता। उनके मुताबिक संबंधित अधिसूचना अभी भी अस्तित्व में है और इसी वजह से वह चाहते हैं कि अदालत मामले की मेरिट पर सुनवाई करते हुए इस अधिसूचना की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला दे।

उनका तर्क है कि यदि किसी अधिसूचना के कारण भविष्य में गरीब टैक्सी और कैब चालकों के रोजगार पर प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है, तो इस मुद्दे का स्थायी और स्पष्ट कानूनी समाधान जरूरी है।

आरटीओ कार्रवाई का मुद्दा भी उठाया

कासिम ने आरटीओ से जुड़ी संभावित कार्रवाई को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की। उनका कहना है कि टैक्सी और कैब चालकों के लिए बैज, परमिट और लाइसेंस उनकी आजीविका से सीधे जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी पर कार्रवाई होने का मतलब संबंधित चालक की कमाई रुक जाना हो सकता है।

उन्होंने कहा कि किसी चालक के पास वाहन होने के बावजूद यदि वह कानूनी रूप से उसे चलाकर कमाई नहीं कर सकता, तो उसके सामने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए इस पूरे मामले को केवल भाषा के सवाल के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार, आजीविका और अधिकारों के व्यापक मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए।

देश के अलग-अलग हिस्सों से मुंबई पहुंचते हैं कामगार

मोहम्मद कासिम ने कहा कि मुंबई की अर्थव्यवस्था में दूसरे राज्यों और क्षेत्रों से आने वाले कामगारों की भी भूमिका है। रोजगार की तलाश में लोग यहां आते हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में मेहनत करके अपना जीवन चलाते हैं। टैक्सी और कैब चालक भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

उनका कहना है कि इन चालकों में कई ऐसे लोग हैं जिनके परिवार उनके ऊपर आर्थिक रूप से पूरी तरह निर्भर हैं। यदि रोजगार के लिए अतिरिक्त भाषा संबंधी शर्तें इस तरह लागू होती हैं कि उससे किसी व्यक्ति की आजीविका छिनने की स्थिति पैदा हो जाए, तो इस पर संवैधानिक दृष्टि से विचार किया जाना आवश्यक है।

‘मेरी लड़ाई किसी समुदाय के खिलाफ नहीं’

मीडिया से बातचीत के दौरान कासिम ने बार-बार स्पष्ट किया कि उनका पक्ष किसी भाषाई समुदाय के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि मराठी भाषी लोगों के अधिकार और सम्मान का वह भी उतना ही सम्मान करते हैं, जितना देश की अन्य भाषाओं और उनके बोलने वालों का।

उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य समाज में किसी तरह का विवाद या वैमनस्य पैदा करना नहीं है। वह केवल यह चाहते हैं कि कानून और सरकारी नीतियों को इस तरह लागू किया जाए जिससे गरीब और मेहनतकश लोगों की आजीविका असुरक्षित न हो।

परिवारों की आर्थिक सुरक्षा का भी सवाल

कासिम ने कहा कि एक टैक्सी या कैब चालक की नौकरी केवल उसकी व्यक्तिगत आय का साधन नहीं होती। उससे पत्नी, बच्चे, माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की जरूरतें जुड़ी होती हैं। यदि चालक का लाइसेंस, परमिट या बैज प्रभावित होता है तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी सीधा असर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक अधिकारों और आजीविका के अधिकार को ध्यान में रखते हुए संतुलित व्यवस्था जरूरी है। भाषा का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन किसी व्यक्ति की मेहनत से जुड़ी रोजी-रोटी भी महत्वपूर्ण है।

मामले के अंतिम न्यायिक निर्णय पर नजर

मोहम्मद कासिम का कहना है कि वह अदालत से इस पूरे मामले पर स्पष्ट और अंतिम न्यायिक निर्णय चाहते हैं, ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति को लेकर कोई असमंजस न रहे। उनका कहना है कि सरकार द्वारा फिलहाल एक वर्ष तक आरटीओ कार्रवाई नहीं करने की बात कही गई है, लेकिन अधिसूचना की संवैधानिक स्थिति का अंतिम निर्धारण अदालत द्वारा मामले की मेरिट के आधार पर किया जाना चाहिए।

उन्होंने दोहराया कि उनका उद्देश्य मराठी भाषा को चुनौती देना नहीं, बल्कि गरीब टैक्सी और कैब चालकों के अधिकारों की रक्षा करना है। कासिम के मुताबिक, भाषा का सम्मान और गरीब की रोजी-रोटी की सुरक्षा—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी भाषाई विविधता और संवैधानिक व्यवस्था से है। ऐसे में किसी भी नीति या अधिसूचना को लागू करते समय सभी वर्गों के अधिकारों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। यही वजह है कि उन्होंने मुंबई हाईकोर्ट में इस मुद्दे को व्यापक संवैधानिक सवाल के रूप में उठाया है।

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