हिंदी की मिठास उसका माधुर्य केवल सम्प्रदाय विशेष के बंधनों में न बंधा रह सका ,जब वह मुसलमान विद्वान अब्दुर्रहीम खानेखाना के हाथ पहुची तो उसका अंदाज़ सूफियाना हो गया ,जिसको सुननेवाले उसके श्रोता साम्प्रदायिक न होकर बल्कि पंथनिरपेक्षता के भाव से लबालब भर उठे ।