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जनता के दिलों में आज भी जिंदा हैं राम लखन यादव

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प्रतापगढ़- पट्टी की धरती आज फिर भावुक है। अपने उस सपूत को याद कर रही है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी जनता के नाम कर दी। पूर्व विधायक राम लखन यादव जी की आज पुण्यतिथि है। उन्हें इस दुनिया से गए चार साल हो चुके हैं, लेकिन सच कहें तो ऐसे लोग कभी जाते नहीं—उनकी यादें, उनके काम और उनका अपनापन हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रहता है।
राम लखन यादव सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि वो आम जनता के बीच के आदमी थे। ऐसे नेता, जो चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि हर वक्त लोगों के साथ खड़े रहते थे। किसी के घर दुख हो या खुशी, क्षेत्र में कोई समस्या हो या गरीब की मदद का सवाल—वे हमेशा सबसे पहले पहुंचने वालों में होते थे। यही वजह थी कि लोग उन्हें नेता कम, अपना परिवार ज़्यादा मानते थे।


उनकी राजनीति बिल्कुल अलग थी। आज जहां राजनीति में स्वार्थ और दिखावा ज्यादा दिखता है, वहीं राम लखन यादव की राजनीति सेवा और सादगी पर टिकी हुई थी। उन्होंने कभी पद या सत्ता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। दो बार विधायक रहने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। वे पहले जैसे सरल, सहज और जमीन से जुड़े इंसान बने रहे।
उनका राजनीतिक सफर समाजवादी विचारधारा से जुड़ा रहा। नेता जी मुलायम सिंह यादव के साथ उन्होंने राजनीति की शुरुआत की और समाजवादी सोच को अपने जीवन में उतारा। वे समाजवाद को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उसे गांव-देहात तक पहुंचाने का काम करते थे।


साल 1989 में उन्होंने पहली बार जनता दल के टिकट पर पट्टी विधानसभा से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के कद्दावर नेता राजेंद्र प्रताप सिंह (मोती सिंह) को हराकर बड़ी जीत हासिल की। यह जीत सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि यह उस भरोसे की जीत थी, जो जनता ने उन पर जताया था।


इसके बाद 1993 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में भाजपा के कैंडीडेट प्रोफेसर शिवाकांत ओझा को लंबे वोटों से शिकस्त दी और फिर दूसरी बार विधायक बने। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र के विकास, गरीबों की मदद, किसानों की समस्याओं और पिछड़े वर्ग के हक के लिए लगातार आवाज उठाई। वे उन नेताओं में थे जो सिर्फ वादे नहीं करते थे, बल्कि उन्हें पूरा करने की कोशिश भी करते थे।


गांव-देहात में आज भी लोग उनके किस्से सुनाते हैं—कैसे वे बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति की मदद करते थे, कैसे किसी गरीब की समस्या सुनकर तुरंत खड़े हो जाते थे, और कैसे हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलते थे। यही वजह है कि उनकी लोकप्रियता सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुंची।


आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने एक ऐसा रास्ता दिखाया, जो सच्ची राजनीति का रास्ता है—ईमानदारी, सादगी और सेवा का रास्ता। उनका जीवन आज की नई पीढ़ी के लिए एक मिसाल है कि अगर नीयत साफ हो और इरादा मजबूत, तो बिना दिखावे के भी लोगों के दिलों में जगह बनाई जा सकती है।


उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का काम उनके परिवार के लोग भी कर रहे हैं। उनके तीन बेटे—अनिल यादव, अतुल यादव और अखिल यादव—आज समाज में अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपने पिता के आदर्शों और जनसेवा की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।


राम लखन यादव भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनके काम और उनकी सादगी हमेशा जिंदा रहेंगे।
ऐसे जननायक को शत-शत नमन।

अधिवक्ता शम्स तबरेज़ की कलम से

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