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करंट ने छीना बड़े भाई का साथ, कंधे पर लादकर अस्पताल पहुंचे ग्रामीण, फिर भी नहीं बची जान; आजादी के बाद से सड़क को तरस रहा गांव

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करंट ने छीना बड़े भाई का साथ, कंधे पर लादकर अस्पताल पहुंचे ग्रामीण, फिर भी नहीं बची जान; आजादी के 79 साल बाद भी सड़क को तरस रहा गांव

प्रतापगढ़। जनपद के रानीगंज थाना क्षेत्र के जामताली दासा चौरा गांव में बुधवार सुबह एक दर्दनाक हादसे ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया। घर में बिजली का स्विच बंद करने के दौरान करंट की चपेट में आए दो सगे भाई गंभीर रूप से झुलस गए। बड़े भाई की उपचार के दौरान मौत हो गई, जबकि छोटे भाई का इलाज जारी है। इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में बदहाल बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार जामताली दासा चौरा निवासी अनिरुद्ध गौतम (45) पुत्र लाल बहादुर गौतम बुधवार सुबह करीब छह बजे नींद से उठने के बाद घर में लगे इलेक्ट्रिक बोर्ड का स्विच बंद करने पहुंचे। जैसे ही उन्होंने स्विच दबाया, वह अचानक बिजली के करंट की चपेट में आ गए। अनिरुद्ध को तड़पता देख उनका छोटा भाई शशि गौतम (28) उन्हें बचाने के लिए दौड़ा, लेकिन वह भी करंट की चपेट में आकर गंभीर रूप से झुलस गया।

हादसे के बाद परिवार में चीख-पुकार मच गई। आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और किसी तरह बिजली का संपर्क हटाकर दोनों भाइयों को बचाया। इसके बाद उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने की कोशिश शुरू हुई, लेकिन यहीं से गांव की बदहाल व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की असल तस्वीर सामने आ गई।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंची है। एंबुलेंस तो दूर, कोई चार पहिया वाहन भी गांव तक नहीं आ सकता। मजबूरन ग्रामीणों ने दोनों भाइयों को चारपाई पर लिटाया और करीब एक किलोमीटर तक पैदल कंधों पर उठाकर मुख्य मार्ग तक ले गए। वहां निजी वाहन की व्यवस्था होने के बाद दोनों को रानीगंज ट्रामा सेंटर पहुंचाया गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने अनिरुद्ध गौतम को मृत घोषित कर दिया, जबकि शशि गौतम का उपचार जारी है।

मृतक अनिरुद्ध गौतम मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। वह तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। उनकी असमय मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। घर में मातम पसरा है और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।

गांव के निवासी पप्पू सरोज और विजय ने बताया कि यदि गांव तक सड़क बनी होती और वाहन सीधे घर तक पहुंच जाता, तो अनिरुद्ध को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकता था। उनका कहना है कि शायद समय पर इलाज मिलने से उनकी जान बच सकती थी। ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के दशकों बाद भी उनका गांव सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला, समाधान नहीं।

इस हादसे ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास के दावे आखिर जमीनी हकीकत से कितने दूर हैं। जब किसी गांव तक सड़क ही नहीं है, तो आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं वहां कैसे पहुंचेंगी? क्या किसी गांव को सड़क दिलाने के लिए हर बार किसी की जान जाना जरूरी है?

ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जामताली दासा चौरा गांव तक तत्काल सड़क निर्माण कराया जाए, ताकि भविष्य में किसी घायल या बीमार व्यक्ति को चारपाई पर ढोकर अस्पताल ले जाने की मजबूरी न हो। साथ ही मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता और छोटे भाई के समुचित इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

बुधवार की यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि उन तमाम गांवों की सच्चाई है जहां आज भी विकास के दावे कागजों तक सीमित हैं। एक ओर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और ग्रामीण विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सड़क के अभाव में एक मजदूर की जान चली जाती है। यह हादसा केवल बिजली के करंट से हुई मौत नहीं, बल्कि व्यवस्था की लापरवाही पर भी गंभीर सवाल छोड़ गया है।

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