बारिश बनी काल! 100 साल पुराना मकान ढहा, पलभर में उजड़ गया पूरा परिवार; माता-पिता, बेटा, बहू और दो मासूमों समेत 6 की दर्दनाक मौत
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प्रतापगढ़। लगातार हो रही बारिश ने बुधवार देर रात प्रतापगढ़ में ऐसा दर्दनाक मंजर पैदा कर दिया, जिसे देखकर हर आंख नम हो गई। नगर कोतवाली क्षेत्र के महुली मोहल्ले में करीब 100 साल पुराना जर्जर मकान आधी रात के बाद अचानक भरभराकर ढह गया। मलबे के नीचे दबकर एक ही परिवार के छह लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। मृतकों में पति-पत्नी, उनका बेटा, बहू और दो मासूम बच्चे शामिल हैं। इस हादसे ने पूरे शहर को गहरे सदमे में डाल दिया।
बताया जा रहा है कि रात में भीषण गर्मी और उमस के कारण परिवार के सात सदस्य घर के एसी वाले कमरे में सो रहे थे। रात करीब दो बजे अचानक तेज धमाके के साथ मकान की छत भरभराकर गिर पड़ी। देखते ही देखते पूरा कमरा मलबे में बदल गया और सभी लोग उसके नीचे दब गए। चारों ओर चीख-पुकार और अफरा-तफरी मच गई।
धमाके की आवाज सुनकर आसपास के लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। लोगों ने तुरंत पुलिस और दमकल विभाग को सूचना दी। स्थानीय लोगों ने भी राहत कार्य शुरू कर दिया। पुलिस, दमकल और बचाव दल ने करीब दो घंटे तक लगातार मलबा हटाकर सभी को बाहर निकाला। घायलों को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने छह लोगों को मृत घोषित कर दिया।
हादसे में मकान मालिक प्रमोद श्रीवास्तव (60), उनकी पत्नी रीता श्रीवास्तव (55), बेटा नितिन श्रीवास्तव (25), बहू माधुरी श्रीवास्तव (23) तथा मासूम माधव (2 वर्ष) और अद्विक (10 माह) की मौत हो गई। परिवार का बड़ा बेटा अमन (28) कमरे के किनारे सो रहा था। छत गिरते ही वह किसी तरह मलबे से बाहर निकल आया और उसकी जान बच गई। लेकिन जब उसने अपने माता-पिता, भाई, भाभी और दोनों भतीजों को मलबे में दबा देखा, तो उसकी चीखें सुनकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें भर आईं।
महुली मोहल्ले में गुरुवार सुबह मातम पसरा रहा। जिस घर में कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सिर्फ सन्नाटा और अपनों को खोने का दर्द बचा है। पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और हर कोई इस दर्दनाक हादसे पर दुख व्यक्त करता नजर आया।
लगातार हो रही बारिश के बीच यह हादसा जर्जर और पुराने मकानों की भयावह हकीकत भी सामने लाता है। सवाल उठता है कि आखिर ऐसे खतरनाक भवनों की समय रहते पहचान और जांच क्यों नहीं हो पाती? यदि कमजोर भवनों को पहले ही चिन्हित कर आवश्यक कदम उठाए गए होते, तो शायद छह जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
प्रतापगढ़ का यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी है जिसने एक ही पल में पूरे परिवार का अस्तित्व मिटा दिया। मासूम बच्चों से लेकर बुजुर्ग माता-पिता तक, किसी को भी संभलने का मौका नहीं मिला। यह दर्दनाक घटना लंबे समय तक लोगों के दिलों में टीस बनकर रहेगी।












