








प्रतापगढ़। क्या किसी परिवार की जिंदगी बचाने के लिए हादसा होना जरूरी है? क्या किसी जर्जर मकान के मलबे में दबने के बाद ही जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुलेगी? क्या प्रशासन उस दिन का इंतजार कर रहा है, जब रानीगंज स्टेशन रोड पर किसी घर की दीवार या छत भरभराकर गिर जाए और उसके नीचे किसी परिवार की चीखें दब जाएं?
रानीगंज नगर पंचायत के वार्ड पूरेगोलिया स्टेशन रोड पर बैंक ऑफ बड़ौदा के बगल स्थित करीब 70 साल पुराना एक मकान इन दिनों किसी बड़े हादसे को दावत देता नजर आ रहा है। इस मकान में विपिन कुमार गुप्ता उर्फ राजू पुत्र स्वर्गीय अशोक कुमार गुप्ता अपने परिवार के साथ रहते हैं। मकान की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि परिवार के लिए हर दिन घर में रहना किसी खतरे से कम नहीं है।
राजू अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ इसी मकान में रहने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि बारिश के बाद स्थिति और भी भयावह हो जाती है। घर के अंदर पानी भर जाने से मकान तालाब जैसा बन जाता है। दीवारों और छत की जर्जर हालत के बीच परिवार को हर पल अनहोनी का डर सताता रहता है।
सवाल यह नहीं है कि हादसा होगा या नहीं, सवाल यह है कि अगर हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
परिवार की मजबूरी को समझने की जरूरत है। जर्जर मकान छोड़कर कहीं सुरक्षित जगह जाना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। अगर आर्थिक स्थिति मजबूत होती तो शायद परिवार जोखिम उठाकर यहां रहने को मजबूर नहीं होता। लेकिन जब सामने रोजी-रोटी और सिर छिपाने की मजबूरी हो, तो इंसान खतरे के बीच भी जिंदगी गुजारने को मजबूर हो जाता है।
स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह मकान किसी सुनसान इलाके में नहीं, बल्कि स्टेशन रोड जैसे आवागमन वाले स्थान पर स्थित बताया जा रहा है। आसपास लोगों की आवाजाही रहती है। ऐसे में यदि मकान का कोई हिस्सा अचानक गिरता है तो सिर्फ उसमें रहने वाला परिवार ही नहीं, बल्कि राहगीरों और आसपास के लोगों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।
चिलबिला समेत जिले की घटनाएं दे रही हैं चेतावनी
प्रतापगढ़ में जर्जर मकानों और पुराने भवनों को लेकर पहले भी हादसे सामने आते रहे हैं। जून 2023 में स्टेशन रोड पर एक जर्जर मकान की छत गिरने से एक वृद्ध और किशोरी समेत चार लोग मलबे में दबकर घायल हुए थे। स्थानीय लोगों ने मलबे से घायलों को बाहर निकाला और उन्हें उपचार के लिए भेजा गया था।
वहीं अगस्त 2026 की शुरुआत में प्रतापगढ़ नगर कोतवाली क्षेत्र के महुली मोहल्ले में करीब 100 साल पुराना जर्जर मकान लगातार बारिश के बीच ढह गया। रिपोर्टों के अनुसार इस दर्दनाक हादसे में एक ही परिवार के छह लोगों की मौत हो गई और एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ।
यही नहीं, जिले में पहले भी बारिश के दौरान जर्जर मकानों के गिरने से लोगों की जान जाने और परिवारों के बेघर होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। रानीगंज क्षेत्र में भी वर्ष 2023 में एक कच्चा मकान अचानक गिर गया था, जिसमें परिवार समय रहते बाहर निकल गया, लेकिन गृहस्थी का सामान मलबे में दबकर नष्ट हो गया।
इन घटनाओं को केवल पुरानी खबरें समझकर भुला देना शायद सबसे बड़ी भूल होगी। हर हादसा प्रशासन और समाज के लिए एक चेतावनी होता है। सवाल यह है कि चेतावनी मिलने के बाद कार्रवाई कितनी जल्दी होती है?
हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले पहुंचे प्रशासन

विपिन कुमार गुप्ता के परिवार का मामला भी इसी तरह की चेतावनी है। मकान की जर्जर स्थिति देखकर अगर समय रहते निरीक्षण कर लिया जाए, खतरे का आकलन कर लिया जाए और परिवार को सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने अथवा आवश्यक सहायता की व्यवस्था कर दी जाए तो शायद किसी संभावित हादसे को टाला जा सकता है।
इस संबंध में रानीगंज नगर पंचायत के ईओ से बात की गई तो उन्होंने कहा कि वह कल मौके पर दिखवाएंगे और जो भी संभव मदद होगी, वह की जाएगी।
ईओ का यह आश्वासन उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन अब जरूरत सिर्फ आश्वासन की नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई की है। संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचकर मकान की वास्तविक स्थिति देखें, परिवार से बातचीत करें और यदि भवन वास्तव में जानलेवा स्थिति में है तो तत्काल सुरक्षा के उपाय किए जाएं।
जिम्मेदारों से जनता के सीधे सवाल
क्या किसी जर्जर मकान को चिन्हित करने के लिए उसके गिरने का इंतजार किया जाएगा?
क्या किसी परिवार को सुरक्षित करने के लिए पहले किसी सदस्य की जान जाना जरूरी है?
क्या बारिश के मौसम में नगर पंचायत क्षेत्र के जर्जर भवनों का सर्वे नहीं होना चाहिए?
क्या ऐसे भवनों में रहने वाले गरीब और मजबूर परिवारों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकती?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर आज जिम्मेदारों को इस खतरे की जानकारी है, तो कल तक इंतजार क्यों?
प्रतापगढ़ में जर्जर मकानों से जुड़े हादसों का इतिहास यह बताने के लिए काफी है कि खतरा काल्पनिक नहीं है। इसलिए रानीगंज स्टेशन रोड के इस मकान को लेकर भी प्रशासन को गंभीरता दिखानी चाहिए।
आज राजू और उनका परिवार मदद की उम्मीद में है। कल कहीं यह खबर न लिखनी पड़े कि “जिस खतरे की सूचना पहले ही दे दी गई थी, उसी ने एक परिवार की जिंदगी उजाड़ दी।”
समय अभी भी हाथ में है। दीवार गिरने से पहले उसे देख लिया जाए, छत ढहने से पहले उसे सुरक्षित कर दिया जाए और किसी मां की गोद उजड़ने से पहले प्रशासन जाग जाए—यही इस खबर का उद्देश्य है।
क्योंकि हादसे के बाद पहुंचने वाला प्रशासन राहत तो दे सकता है, लेकिन हादसे से पहले पहुंचने वाला प्रशासन किसी की जिंदगी बचा सकता है।







