
प्रतापगढ़।जनपद के रानीगंज कस्बे में स्थित ट्रामा सेंटर, जहां हर दिन सैकड़ों मरीज अपनी जान बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, आज खुद बदहाल व्यवस्था का शिकार बन चुका है। यहां इलाज तो किसी तरह मिल रहा है, लेकिन पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा पूरी तरह ध्वस्त है। हालत यह है कि मरीज और उनके तीमारदार पानी के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं और अंततः उन्हें बाहर से पानी खरीदकर अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है। यह स्थिति न केवल शर्मनाक है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल भी खड़ा करती है।
ट्रामा सेंटर, जो क्षेत्र की सबसे अहम इमरजेंसी सुविधा है, वहां हर छोटी-बड़ी दुर्घटना, मारपीट या गंभीर बीमारी के मामलों में मरीजों की भीड़ उमड़ती है। कई बार यह संख्या सैकड़ों से बढ़कर हजारों तक पहुंच जाती है। ऐसे में जब लोग दर्द और परेशानी से जूझते हुए यहां आते हैं, तो उन्हें कम से कम साफ पानी जैसी सुविधा मिलनी चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि यहां पानी की एक बूंद तक उपलब्ध नहीं है। भीषण गर्मी में मरीजों के हलक सूख रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों की संवेदनाएं भी मानो सूख चुकी हैं।
मरीजों और उनके तीमारदारों का कहना है कि कई बार इस समस्या की शिकायत संबंधित अधिकारियों से की गई, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला। पानी जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव स्वास्थ्य सेवाओं की गंभीर स्थिति को उजागर करता है। जहां एक ओर सरकार बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है।
इस संबंध में ट्रामा सेंटर के अधीक्षक डॉ. नौशाद हुसैन ने बताया कि ट्रामा सेंटर का कोई अलग बजट नहीं है और यह सीएचसी के बचत बजट पर ही संचालित हो रहा है। उन्होंने कहा कि वॉटर कूलर की व्यवस्था के लिए संबंधित विभाग को पत्र भेजा गया है और उम्मीद है कि जल्द ही यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। हालांकि, फिलहाल मरीजों की परेशानी जस की तस बनी हुई है।
गौरतलब है कि समाज में कई ऐसे समाजसेवी और संगठन सक्रिय हैं जो समय-समय पर जरूरतमंदों की मदद करते रहते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े ट्रामा सेंटर में अभी तक किसी समाजसेवी का ध्यान इस ओर नहीं गया। यदि कोई समाजसेवी यहां एक वॉटर कूलर की व्यवस्था कर दे, तो प्रतिदिन हजारों लोगों को राहत मिल सकती है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन और समाजसेवी इस गंभीर समस्या को कब तक नजरअंदाज करते हैं और कब मरीजों को इस मूलभूत सुविधा से राहत मिलती है।
मरीजों के बयान:
- “इलाज तो मिल रहा है, लेकिन पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।”
- “इतनी गर्मी में बिना पानी के रहना मुश्किल हो रहा है।”
- “हम गरीब लोग हैं, रोज पानी खरीदना भारी पड़ रहा है।”
- “अस्पताल में पानी नहीं मिलेगा तो कहां मिलेगा?”
- “बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान हैं।”
- “कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।”
तीमारदारों के बयान:
- “मरीज को संभालें या पानी ढूंढें, समझ नहीं आता।”
- “बाहर से बोतल खरीदना मजबूरी बन गया है।”
- “सरकारी अस्पताल में ये हालत शर्मनाक है।”
- “अगर पानी की व्यवस्था हो जाए तो बड़ी राहत मिलेगी।”







